बिहार

बिहार में ग्रामीण महिलाएं अब गृहणी से बन रही उद्यमी, आर्थिक तौर पर हो रही सशक्त

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पटना। वह दिन लद गए जब महिलाएं घरों में कैद रहती थीं और उनकी पहचान सिर्फ एक चूल्हा-चौका करने वाली गृहणी तक ही सीमित हुआ करती थी। सरकार के सहयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के माध्यम से अनगिनत महिलाओं को रोजगार मिल चुका है। आज प्रत्येक जीविका दीदी अपने घर में ही सरकारी सहायता से कोई ना कोई स्वरोजगार शुरू कर चुकी हैं और इसके सहारे वे अपने घर की आर्थिक नींव को मजबूती प्रदान कर रही हैं।

जीविका दीदियों के गृहणी से उद्यमी बनने का प्रत्यक्ष उदाहरण पटना के गांधी मैदान के सरस मेले में लगे उनके अलग-अलग स्टाल हैं। यहां किराना, धूप-अगरबत्ती, वस्त्र, श्रृंगार के सामान, स्वादिष्ट व्यंजनों के स्टाल न सिर्फ आगंतुकों को आकर्षित कर रहे हैं बल्कि यहां पहुंचने वाले लोग बिहार के पारंपरिक और सांस्कृतिक विरासत की पहचान इन सामग्रियों की दिल खोलकर खरीददारी भी कर रहे हैं।

पटना के गांधी मैदान में हर वर्ष सितंबर और दिसंबर में यानी दो बार सरस मेले का आयोजन होता है। यह आयोजन ग्रामीण विकास विभाग कराता है। इस बार 12 दिसंबर को साल का दूसरा मेला शुरू हुआ। मेले में ढाई सौ से अधिक समूह की महिलाओं ने अपने स्टाल लगाए। बिहार के सभी जिलों से महिला उद्यमी, शिल्प कलाकृति और व्यंजनों के साथ महिलाएं यहां पहुंची हैं। समूह की महिलाओं ने फूड, हाथों से तैयार सजावटी, सौंदर्य प्रसाधन, वस्त्र और दूसरे घरेलू सामान के स्टाल लगा रखे हैं। मेले के नोडल अधिकारियों का मानना है कि इस वर्ष 28 दिसंबर तक मेले में करीब 24 करोड़ रुपए से भी ज्यादे का कारोबार हो चुका है। यानी मेले में प्रत्येक दिन औसतन एक करोड़ 40 लाख से अधिक का कारोबार हुआ है।
मेले में स्टॉल लगाने वाली समूह की कुछ महिलाओं का मानना है कि उनका हर दिन औसतन 30 से 40 हजार का कारोबार हो रहा है। इन महिलाओं का कहना है कि उनके कदम कभी घर में रसोई की चौकट तक कैद थे जो आज बाहर निकलकर समूह के माध्यम से परिवार की आर्थिक नींव को मजबूत बना रहे हैं। प्रत्येक समूह को सरकार की ओर से आर्थिक मदद की जा रही है जिसके सहारे वह खुद के साथ दूसरी लाचार और बेबस महिलाओं को रोजगार मुहैया कराकर जिंदगी के रंग में रोशनी भरने का काम कर रही हैं।

धूप, अगरबत्ती से वर्ष में लाखों का मुनाफा

प्रगति जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य प्रेमलता ने बताया कि 2017 से पहले तक वह गृहणी थीं। पति की अच्छी आमदनी थी। इस बीच उनके पति का एक्सीडेंट में हाथ फैक्चर हो गया। पति की नौकरी छूटी तो बच्चों की पढ़ाई भी बंद हो गई। घर में दो जून रोटी का भी संकट खड़ा हो गया। फिर वह जीविका समूह से जुड़ीं। शुरुआती दिनों में पापड़, अचार, अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया। उनकी मेहनत रंग लाने लगी। उन्होंने बेगूसराय में ईको रुरल सेल्फ एंप्लायमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आरसीइटीआई) ट्रैनिंग लीं। फिर घर में ही पर्यावरण फ्रेंडली धूप, अगरबत्ती आदि बनाने का काम शुरू किया। आज उनका महीने में दो से तीन लाख का कारोबार हो रहा है।

किराने की दुकान से बदली तकदीर, साल में लाखों का कारोबार

ऋचा जीविका स्वयं सहायता समूह की सदस्य निर्मला देवी ने बताया कि उनके किसान पति की 2012 मौत हो गई। बेटी की पढ़ाई की बात तो दूर, पेट भरने के लिए घर में पैसे नहीं थे। दूसरे के घरों में चौका-बर्तन करने की नौबत खड़ी हो गई। इसी बीच उनकी पहचान की जीविका दीदी ने उन्हें खुद के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। समूह के सहारे किराने की दुकान में सरकार से सहयोग दिलवाया। आज निर्मला एक सफल उद्यमी बन चुकी हैं। उनके किराने की दुकान में कई महिलाओं को रोजगार मिल चुका है। आज उनकी महीने का कारोबार चार से छह लाख रुपए का है। गांधी मैदान के सरस मेले में अभी तक करीब पांच लाख रुपए का कारोबार हो चुका है।

जीविका दीदियां उद्यमशिलता की मिसाल हैं। परियोजना से जुड़ने के बाद जीविका दीदियों के परिवारों की औसत वार्षिक आय तेजी से बढ़ी है। जीविका दीदियां अपने परिवार के साथ ही राज्य को भी आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा रही हैं। कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनके उत्पादों की बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।
– श्रवण कुमार (मंत्री, ग्रामीण विकास विभाग सह परिवहन विभाग, बिहार सरकार)

Ali Ahmad

लेखक के बारे में : अली अहमद - चौपाल संदेश के संपादक है । 'चौपाल संदेश' के संपादक के रूप में जन-सरोकार, राजनीति और समसामयिक विषयों पर निष्पक्ष एवं सटीक पत्रकारिता का अनुभव। समाज के हर वर्ग से जुड़ी अहम ख़बरों और ज़मीनी मुद्दों को पाठकों तक पहुँचाना ही मुख्य ध्येय है। ग्राउंड रिपोर्टिंग, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर निष्पक्ष विचार व सटीक ख़बरों के लिए प्रतिबद्ध।

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