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जगदलपुर. Chhattisgarh। छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा का 75 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान मंगलवार 26-10-2026 को माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की ससम्मान विदाई के साथ संपन्न हो गया। जगदलपुर स्थित राजमहल परिसर के ऐतिहासिक मां दंतेश्वरी मंदिर में पारंपरिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पुलिस के जवानों ने माता को सलामी दी और श्रद्धालुओं ने जयकारों तथा पुष्पवर्षा के बीच माता को भावपूर्ण विदाई दी।

बस्तर की अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े इस आयोजन के समापन अवसर पर मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण रहा। सिर पर कलश धारण किए महिलाओं ने मंगल गीत गाकर माता को विदाई दी। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

फूलों से सजाया गया माता की विदाई का मार्ग

माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की ऐतिहासिक विदाई यात्रा को विशेष रूप से सजाया गया था। दंतेश्वरी मंदिर परिसर और विदाई मार्ग पर लगभग डेढ़ क्विंटल गेंदे, गुलाब और बासंती फूलों की पंखुड़ियों का उपयोग किया गया।

डोली के प्रस्थान के समय श्रद्धालुओं ने माता के जयकारे लगाए और गुलाब की पंखुड़ियों की पुष्पवर्षा कर विदाई दी। धार्मिक आस्था, पारंपरिक रीति-रिवाजों और भावनात्मक माहौल के बीच संपन्न हुई यह रस्म बस्तर दशहरा के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रही।

15 साल पुरानी चांदी जड़ित डोली रही आकर्षण का केंद्र

माता की विदाई के दौरान बेल और सागौन की लकड़ी से निर्मित लगभग 15 वर्ष पुरानी डोली विशेष आकर्षण का केंद्र रही। इस डोली में करीब चार किलोग्राम चांदी जड़ी हुई है। इसके दोनों ओर चांदी की प्रतिमाएं और 45 चांदी के गुब्बे लगे हुए हैं।

लगभग 20 किलोग्राम वजनी इस डोली का बस्तर की धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व है। इसकी बनावट और चांदी की सजावट श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी रही।

बस्तर राजपरिवार के सदस्य ने श्रद्धालुओं के साथ उठाई डोली

परंपरा के अनुसार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव और श्रद्धालुओं ने माता की डोली को कंधों पर उठाया। डोली को विधिवत जिया डेरा तक पहुंचाया गया। इसके बाद माता की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र को दंतेवाड़ा के लिए विदा किया गया।

यह पारंपरिक प्रक्रिया बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय जनसमुदाय की गहरी धार्मिक आस्था को दर्शाती है।

5 हजार से अधिक पैकेटों में प्रसाद का वितरण

माता की विदाई के पावन अवसर पर मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। आयोजन के दौरान 76 किलोग्राम बूंदी और लड्डू से तैयार किए गए 5 हजार से अधिक पैकेट बांटे गए।

विदाई की पारंपरिक रस्म के तहत माता को 25 किलोग्राम चावल, 11 किलोग्राम दाल, घी, मसाले और श्रृंगार सामग्री भी भेंट स्वरूप अर्पित की गई।

75 दिवसीय बस्तर दशहरा का विधिवत समापन

बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ की विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसकी परंपराएं स्थानीय देवी-देवताओं, जनआस्था और बस्तर की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी हुई हैं। इस पर्व के दौरान लंबे समय तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक आयोजन संपन्न होते हैं।

माता मावली की डोली और मां दंतेश्वरी के छत्र की विदाई के साथ ही 75 दिनों तक चले विशाल धार्मिक अनुष्ठानों का औपचारिक समापन हो गया। इस अवसर ने एक बार फिर बस्तर की समृद्ध परंपराओं, सामुदायिक सहभागिता और धार्मिक आस्था की अनूठी झलक प्रस्तुत की।

बस्तर दशहरा का हुआ समापन, कलश यात्रा के साथ माता मावली को दी गई आत्मीय विदाई

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By Ali Ahmad

लेखक के बारे में : अली अहमद - चौपाल संदेश के संपादक है । 'चौपाल संदेश' के संपादक के रूप में जन-सरोकार, राजनीति और समसामयिक विषयों पर निष्पक्ष एवं सटीक पत्रकारिता का अनुभव। समाज के हर वर्ग से जुड़ी अहम ख़बरों और ज़मीनी मुद्दों को पाठकों तक पहुँचाना ही मुख्य ध्येय है। ग्राउंड रिपोर्टिंग, राजनीतिक विश्लेषण और सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर निष्पक्ष विचार व सटीक ख़बरों के लिए प्रतिबद्ध।